Sunday, 15 May 2016

सूखे दरख़्त कि मानिंद ये जां हो गयी है

सूखे दरख़्त कि मानिंद ये जां हो गयी है
रातें अँधेरी अब लगता है जवां हो गयी
दिन की तपिश से जल उठती है रूह
ठंडक कि ए चांदनी तेरी तलब हो गयी है

दिन कि रौशनी में बदलते चेहरे
चमकते धोखे, बिलखते मोहरे
दिल के घर ये कैसी शाम हो गयी है
खुद कि चौखट से अनजान हो गयी है

बदलते रिश्ते और बंटवारा दिलों का
रोज का काम जहाँ में मनचलों का
कैसे समझें ये जिंदगी क्या हो गयी है
जलते जलते खुद ही शमशान हो गयी है

धीरेन्द्र सिंह चौहान