Wednesday, 24 September 2014

लाल दुपट्टे वाली..


तेरे दुपट्टे के रंग में कुछ यूँ रंगा हूँ में
न जीना आये, न मरना ही आये

सुर्ख लाल रंग की चुनर ओढ़ी है जो तुमने
 देखकर इसे, तेरा चेहरा ही याद आये

ना ढाओ सितम यूँ ना जुल्म ही करो
दुआ ही करो जब दवा कोई काम ना आये

आदत ही है तुम्हारी यूँ जलवे बिखेरने की
और किस्मत है अपनी के दीदार हो जाये

हमे ही रहना होगा कुछ अब संभलकर
ना जाने कब यूँ कही कोई बिजली गिरा जाए

ख़ुसनसीबी है अपनी, तुम दोस्त हो मेरे, नायाब हो, खूबसूरत हो.
सलामत रहना, मुस्कुराते रहना, दिल से बार बार यही फ़रियाद आये.

धीरेन्द्र सिंह चौहान "देवा"


Tuesday, 23 September 2014

चाहत....



तुम कभी जब दिख जाओ तो यूँ लगे वक़्त थम गया है
गीत कोई गा रहा है नगमे गुनगुना रहा है
वो पल सुनहरा हुआ है, मदमस्त मन मदहोश हुआ है
तुम कभी जब दिख जाओ तो यूँ लगे वक़्त थम गया है

मन में ख़याल जगने लगे हैं, तेरे रूप का दीदार हुआ है
नयनो की झीलों में डूबे हैं, मन मयूर नाचने लगा है
फूल सब खिलने लगे हैं, सारा जहाँ महकने लगा है
 तुम कभी जब दिख जाओ तो यूँ लगे वक़्त थम गया है

चंद्रमुखी हो या अप्सरा कोई, रूप का यूँ श्रृंगार हुआ है
तुम जो देखो मुस्कुरा कर,  तन मन ये चहकने लगा है
चेहरे में खोयी है नजर,  ये मंजर भी खामोश हुआ है.
तुम कभी जब दिख जाओ तो यूँ लगे वक़्त थम गया है

तुम न जाना दूर कभी, वरना जीवन एक सजा है
यूँ ही मुस्कुरा कर बातें करना,  दिल को मेरे सुकून मिला है
तुम्हे चाहा है बड़ी सिद्दत से, तुम्हे पाने की लालसा है
सच होगा जब पा जायेंगे तुम्हे, के ये वक़्त कुछ थम गया है,

धीरेन्द्र सिंह चौहान "देवा"

Friday, 5 September 2014

तुम...


तुमने कहा था मुझे भुला देना जब में नहीं
बसा लेना दुनिआ अपनी जहा में नहीं
मगर मेरे प्यार को रखना संभालकर कुछ इस तरह
के जिसकी हसरत में रखूं पर तुम नहीं

याद है अब भी तुम्हारा आना उस प्रेम की चौखट पर
गुनगुनाना गीत कोई आकर मुझसे यूँ लिपटकर
मगर आज उस घर में तो में रहता नहीं
कोई हवा बहती भी होगी या तो नहीं

वक़्त बदला हालात बदले ये देश बदला
उम्र बदली सोच बदली ये रंग बदला
तुम न बदले हो अभी भी मेरी सोच में
ना वो चेहरा ही और न चश्मे नूर बदला

खोकर किसको अब पा जाऊंगा में तुम्हे
तुम भी न करना याद कभी भूले से हमे
यूँ ही दुनिआ चलती है ये दिन चले जायेंगे.
मिल जो जाओ कभी किसी मोड़ पर, देखकर मुस्कुरा देना हमे...

धीरेन्द्र सिंह चौहान "देवा"

Thursday, 4 September 2014

वाकिफ हूँ में ....

वाकिफ हूँ  में .... 

ऐ शहर तेरे दर्द से वाकिफ हूँ में, तेरी याद दिल को को झकझोर देती हैं 
टूट जाता हूँ में में.. ऐ शहर तेरे दर्द से वाकिफ हूँ में, 

उस पथरीली राह पर अब धूल उड़ती नहीं ना जाने कहाँ खो गयी 
वो फूलों का बाजार यहाँ होता था वो खुसबू अब जाने कहाँ गयी 
वो दमकता चेहरा, सुबह की ताजगी, अपने रंग में खुसी से लरजते लोग 
चहकता बचपन, पाठशाला का शोर, और उस राह पर चलने  वालों का जोर 
सुनहरी शाम की हलकी सी थकान,  जाने कहाँ खो गयी 

सदियों से समेटे हुए बृहद इतिहास को छुपा लिया  
तेरे तकदीर की इस दास्तान से वाकिफ हूँ में ऐ शहर तेरे दर्द से वाकिफ हूँ में 

कई रंग देखे और तेरी बादशाहत भी देखि
वो तेरे अस्तित्व को बचाये रखने की वो लम्बी लड़ाई भी देखि
हजारों गाओं का हुजूम उमड़ता था ऐसी सुबह और कई शाम भी देखि
किसी का बचपन और किसी की ममता, वो पाठशाला और दौड़ धुप भी देखि
सदियों से चला आ रहा और चुपचाप इतिहास बनता जाता ऐसी कागज़ पर वो स्याही भी देखि

मगर जो कल था और कल जो होगा, बहुत बदल गया और बदल जायेगा
तेरे शहर वालों के बदले हालत और ठिकानो से वाकिफ हूँ मेंऐ शहर तेरे दर्द से वाकिफ हूँ में

पावन गंगा की  धारा और महलों से सजा हुआ बृहद गढ़वाल को अपने में समेटा हुआ
हरियाली से लहकते खेत, सब और फूलों से घिरा हुआ
आज मिला था एक बूढा बूढा उम्र की लाठी पर झुका हुआ बीते बचपन की यादों और तेरे हाल पर रोता हुआ
लगता था अब सब ख़त्म हो गया एक ऐतिहासिक धरोहर फिर से नुमाइस के लिए तैयार है
आज लोग बस घूमने जाते हैं और यादें ले जाते हैं, सायद ही कोई तेरी कुर्बानी को जानता होगा

इंसान क्यों हैं ऐसे वाकिफ हूँ में
ऐ शहर तेरे दर्द से वाकिफ हूँ में........

धीरेन्द्र सिंह चौहान "देवा" 

ऐतिहासिक शहर टिहरी को समर्पित।