Saturday, 1 August 2015

शायरी

तू ही मेरी शायरी 
दिन भी तू,रात भी तू,
चैन भी नींद भी 
सबमे शामिल है तू 
बता तुझे कैसे कहूँ कैसे लिखूं 
कैसे बयां करूँ
एक अलबेला अहसास है तू
मेरा दर्पण है तू
मेरी सूरत है है तू
संवर जाता हूँ में
जब श्रृंगार करती है तू।

Thursday, 23 July 2015

माया मन

माया मन उड़ी गे जू
जाणी कीजाणि क्या ह्वे होलु
उड़ी गे जू माया में कैकी
जाणी कीजाणी कख होलु
माया मन उड़ी गे जू जाणी कीजाणि क्या ह्वे होलु

छा कुछ सुपिन्या और छा कुछ ख्याल
देखि चा मिन जू और समझी छा आज
थों ख्यालों मा में कखि ख्वे होलु
माया मन उड़ी गे जू जाणी कीजाणि क्या ह्वे होलु

इक मुखड़ी छे याद औणी मेरा मन मा
कख देखि होली और के जनम मा
में जनमो जनमो तक खुजे ल्योलू
माया मन उड़ी गे जू जाणी कीजाणि क्या ह्वे होलु

जनि भी होली वा और होली जू
होली वा मेरी और में वेंकु
कब शुभ घडी दिन बार अालु
माया मन उड़ी गे जू जाणी कीजाणि क्या ह्वे होलु

धीरेंद्र  सिंह चौहान "देवा"
(स्वरचित)

Wednesday, 15 July 2015

दिल की बातें

कब समझोगे दिल की बातें
तुम नादां अब और नहीं
में मनाऊं तुम्हे हर रुठने पर
ये कहानी वो नहीं
ढल जाए जो शाम यही पर
ये राहें अब वो नहीं
कब समझोगे दिल की बातें
तुम नादां अब और नहीं
यूँ तो नगमे गाये हैं लोगों ने
हम जो गाये वो गीत नहीं
कब अमर है प्रेम जहाँ में
और ऐसी कोई प्रीत नहीं
क्या याद रक्खे कोई हमे
अब है वो निशानी और नहीं
कब समझोगे दिल की बातें
तुम नादां अब और नहीं

धीरेन्द्र सिंह चौहान "देवा"

Thursday, 4 June 2015

कुछ तो बात होगी तुम्हारे हुस्न की। में बेबाक कैसे तारीफ़ करू अल्फाज ढूंढता हु।

होते होंगे रिश्ते ख़त्म गलतफहमिओं में। हमने तो मोहब्बत ही कर डाली ग़लतफ़हमी में।

Wednesday, 3 June 2015

कशिश

वक्त ने रहम किआ कुछ हम पर ऐसे
जब ना थी उम्मीद तब वो सामने आये

ना समझे कुछ बेजुबां से हो गए
अश्कों ने समझा चस्म कुछ नम हुए

बड़ी बदसुलूकी ये दिल कर रहा था
ये कैसी कशिश थी कुछ समझ नहीं पाए

पूछेंगे तो सवाल मिलने पे उनके
न वो कुछ कह पाये न हम कुछ कह पाये

नाम आख्नो ने बयां कर दी परेशानी दिल की
भुला दिया सब कुछ जब  तुम  पास आये.

धीरेन्द्र सिंह चौहान "देवा"

Tuesday, 2 June 2015

यारों कि यारी

यारों कि यारी

यारों की ऐसी यारी में महफिल सजा ली हमने
मजबूर हुआ कुछ ऐसा कलम उठा ली हमने
लिखना चाहा दिल को बड़े अरमानो के साथ
जाने ये क्या हुआ सब जुबानी बता दिआ हमने

दिल की ये दुनिया मेरे यारों से ही चलती है
दूर् रहु जब इनसे यारी बड़ी बुरी खलती है
जब तक बातें ना हो दो चार इधर उधर की
तुम ही जानो यार ये शाम कैसे ढलती है

सुक्र्गुजार हूँ खुदा तेरा ये जो रीत बनायी है
दुनिया में दोस्त बनाकर ये दोस्ती सीखलायी है
दुआ करता हूँ तुझसे इन्हे खुस रखना तुम हरदम
फुल मेरी बगिया के हैं जिनसे ये रौनक आयी है.  

धीरेंद्र सिंह चौहान "देवा"