Wednesday, 3 June 2015

कशिश

वक्त ने रहम किआ कुछ हम पर ऐसे
जब ना थी उम्मीद तब वो सामने आये

ना समझे कुछ बेजुबां से हो गए
अश्कों ने समझा चस्म कुछ नम हुए

बड़ी बदसुलूकी ये दिल कर रहा था
ये कैसी कशिश थी कुछ समझ नहीं पाए

पूछेंगे तो सवाल मिलने पे उनके
न वो कुछ कह पाये न हम कुछ कह पाये

नाम आख्नो ने बयां कर दी परेशानी दिल की
भुला दिया सब कुछ जब  तुम  पास आये.

धीरेन्द्र सिंह चौहान "देवा"

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