Tuesday, 30 December 2014

ग़ज़ल

हम गर नजर मिलाये जो उनसे तो क्या बात हो
वो निगाहों से समझे राज सारे तो क्या बात हो.
हम गर नजर मिलाये जो उनसे तो क्या बात हो

चाहें तो हम यही कि मेरी वो नजरबंद हो.
और वो बैठ जाए मेरे सामने तो क्या बात हो
हम गर नजर मिलाये जो उनसे तो क्या बात हो

हम गा रहे हैं नग्में महफिल भी ये जंवा है
और प्यार से वो झूम जाएँ तो क्या बात हो
हम गर नजर मिलाये जो उनसे तो क्या बात हो

पहले नही हुआ जो वो कुछ आज हो ही जाए
कर दे कबूल हमे सरेआम तो क्या बात हो
हम गर नजर मिलाये जो उनसे तो क्या बात हो

हम गर नजर मिलाये जो उनसे तो क्या बात हो
वो निगाहों से समझे राज सारे तो क्या बात हो.
हम गर नजर मिलाये जो उनसे तो क्या बात हो

धीरेंद्र सिंह चौहान "देवा"

Monday, 29 December 2014

कश्मकश...


तुझसे भी ये जाने कैसी रिस्तेदारी हो गयी है.
ना थे जिस कम के उसकी अब जिम्मेदारी हो गयी है.

तुझे यूँ ही चाहना सबब बन गया है.
दिल की भी ये जाने कैसी लाचारी हो गयी है.

हर पल हम अब ख़बर तुम्हारी रखते हैं "देवा"
दोस्तों में भी अब हमारी किस्सेदारी हो गयी है.

यूँ ही इबादत करेंगे हम तेरी मोहबत की.
तू चाहे या ना चाहे, कुछ ऐसी जवाबदारी हो गयी है.

धीरेंद्र सिंह चौहान "देवा"
  

Friday, 19 December 2014

एहसास..

ना करेंगे अब हम बातें हजार उनसे.
रहने दो टूटा ना जोड़ों कोई तार उनसे..
यूँ ही पड़ा रहने दो मेरे खयालो को बिखरा
ना जुड़ने के हैं कोई आसार उनसे..
आज कह दिया किसी को हमने एहसास हमारा
रहे सलामत ये ये हमारा एहसास उनसे...
दुनिया में तो मिलने को और भी होंगे
नही दरकार कोई, ऐसी लगी है कुछ ख़ास उनसे
कुछ भी कह  दो अब हमे तुम लोगो
हमे जाना है दुबारा मिलने फिर आज उनसे
वो जाने हमे समझते होंगे क्या कुछ.
ना जानेंगे कभी पूछकर ये बात उनसे.

धीरेंद्र सिंह चौहान "देवा"

Tuesday, 2 December 2014

काश...

काश तू मुझे फिर से जीने की मोहलत दे दे.
एक बार और मुझे मेरी बचपन कि जिद दे दे
फिर से ही एक बार वो पट्टी pahaada मेरे  हाथों में दे दे
मनाऊँ कैसे तुझे मुझे बचपन मेरा दुबारा से जीने दे दे

तेरे ही सवालों से परेशान हूँ में आजकल
मुझे तो कभी कभार इन सवालों से छुटकारा दिला दे
मेरे पास अब तो जवाब कुछ भी नही
तू बस अब जवाब बन. मुझे मेरी नयी राह दिखा दे

अब फिर से चुप जाऊँ में कही बचपन के उन खेलों में
फिर से लड़ मार जाऊँ उन जीवंत घरौंदों में
वो मिट्‍टी आज फिर मेरे सीने लगा दे
मुझे तेरी कसम वो प्यारा बचपन दिला दे

तुझे जीतूं या हरूँ हर हाल में हार मेरी है
तुझे पुकारुन या याद करूँ, ये हालत मेरी है.
कुछ तो तरस कर मुझ पर और सुन ले जरा
कुछ नही तो तू मुझे अपने आप को वापस मिला दे.

धीरेंद्र Singh चौहान "देवा"