सूखे दरख़्त कि मानिंद ये जां हो गयी है
रातें अँधेरी अब लगता है जवां हो गयी
दिन की तपिश से जल उठती है रूह
ठंडक कि ए चांदनी तेरी तलब हो गयी है
दिन कि रौशनी में बदलते चेहरे
चमकते धोखे, बिलखते मोहरे
दिल के घर ये कैसी शाम हो गयी है
खुद कि चौखट से अनजान हो गयी है
बदलते रिश्ते और बंटवारा दिलों का
रोज का काम जहाँ में मनचलों का
कैसे समझें ये जिंदगी क्या हो गयी है
जलते जलते खुद ही शमशान हो गयी है
धीरेन्द्र सिंह चौहान
रातें अँधेरी अब लगता है जवां हो गयी
दिन की तपिश से जल उठती है रूह
ठंडक कि ए चांदनी तेरी तलब हो गयी है
दिन कि रौशनी में बदलते चेहरे
चमकते धोखे, बिलखते मोहरे
दिल के घर ये कैसी शाम हो गयी है
खुद कि चौखट से अनजान हो गयी है
बदलते रिश्ते और बंटवारा दिलों का
रोज का काम जहाँ में मनचलों का
कैसे समझें ये जिंदगी क्या हो गयी है
जलते जलते खुद ही शमशान हो गयी है
धीरेन्द्र सिंह चौहान
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