Tuesday, 2 June 2015

यारों कि यारी

यारों कि यारी

यारों की ऐसी यारी में महफिल सजा ली हमने
मजबूर हुआ कुछ ऐसा कलम उठा ली हमने
लिखना चाहा दिल को बड़े अरमानो के साथ
जाने ये क्या हुआ सब जुबानी बता दिआ हमने

दिल की ये दुनिया मेरे यारों से ही चलती है
दूर् रहु जब इनसे यारी बड़ी बुरी खलती है
जब तक बातें ना हो दो चार इधर उधर की
तुम ही जानो यार ये शाम कैसे ढलती है

सुक्र्गुजार हूँ खुदा तेरा ये जो रीत बनायी है
दुनिया में दोस्त बनाकर ये दोस्ती सीखलायी है
दुआ करता हूँ तुझसे इन्हे खुस रखना तुम हरदम
फुल मेरी बगिया के हैं जिनसे ये रौनक आयी है.  

धीरेंद्र सिंह चौहान "देवा"

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